बिखरे रहते हैं शब्द यहां वहाँ
कुछ चमकते कुछ झिलमिलाते
आँखों की पुतलियों सामने तिलमिलाते
कुछ तीक्ष्ण होते, कुछ धुंधलाते
तैरते रहते हवाओं में
कैद कर लेता उन्हें, स्याही में
जैसे कोई जिन हो , सुराही में
रगड़ कर फिर सुराही
निकालता उन शब्दों को बाहर
पिरो देता फिर बटोर कर
पन्नों के धागे में, अनजाने में
लो तैयार है एक और रचना
जिसका सफर थोडा मुश्किल होगा
तुम तक पहुँच पाने में ।
- मुदित