कल सुबह दिखीं मुझे कुछ

कविताएँ एक कोटे के बाहर

हाथ में राशन कार्ड लेकर

लाइन लगाये,

उन्हें देखते ही मैंने अपनी

साईकिल में लगाया ब्रेक और

सीधे जा पहुँचा कोटेदार के पास,

बतायी कोटेदार नें उन कविताओं

की व्यथा,

उन्हें चाहिए था दूसरे के राशन

कार्ड पर एक-एक लीटर मिट्टी

का तेल।

चाहा मैंने जब कविताओं से

इसका जवाब,

वेदना से लाल हुए गालों और

नम आँखों से कविताओं नें

कहा, "जब से हमारे मालिकों

नें हुकूमत के ड़र से हमें

कर दिया अपनी जिंदगी से

बेदखल , कहीं और न मिल

सका हमें ठिकाना,

राह चलते लोग अब देते हैं

हमें डूब मरने का ताना,

लाचार होकर लिया हमने

फैसला अब खुद को आग

लगाकर भस्म कर लेने का"।