[caption id="attachment_11225" align="alignnone" width="300"] Kambakht[/caption]उठा जब एक ज़ोर-सा दर्द कहीं कमबख़्त इस सीने में, लगा यूँ की है वाक़ई में नहीं कोई मज़ा अब जीने में। कमबख़्त दिल के ज़ख्म को सीते-सीते रूह तक भी मेरी आह कर बैठी... हम तो हर जवाब लिए बैठे थे उनका फिर कमबख़्त साँसे ही हमसे दगा कर बैठी...