Kambakht[/caption]उठा जब एक ज़ोर-सा दर्द कहीं
कमबख़्त इस सीने में,
लगा यूँ की है वाक़ई में नहीं
कोई मज़ा अब जीने में।
कमबख़्त दिल के ज़ख्म को सीते-सीते
रूह तक भी मेरी आह कर बैठी...
हम तो हर जवाब लिए बैठे थे उनका
फिर कमबख़्त साँसे ही हमसे दगा कर बैठी...