"स्त्रियाँ भी, गिलहरी-साँप भी एक समान।नेत्रों से तीन सौ साठ अंश तक दृष्टि साधती स्त्रियाँ।तत्र-विषम्, हाय! उड़कर डँसती है गिलहरी भी।गिलहरियाँ ही तो हैं, विष-मर्त्य-स्वरूप।धरती पर जिसे तुम “स्त्री” कहते हो,वह तो बस वंश का एक नाम है।"
"स्त्रियाँ भी, गिलहरी-साँप भी एक समान।नेत्रों से तीन सौ साठ अंश तक दृष्टि साधती स्त्रियाँ।
तत्र-विषम्, हाय! उड़कर डँसती है गिलहरी भी।गिलहरियाँ ही तो हैं, विष-मर्त्य-स्वरूप।
धरती पर जिसे तुम “स्त्री” कहते हो,वह तो बस वंश का एक नाम है।"