हम वास करते भूमि — क्या भूमि,देवताओं का खुला खुला स्थान।दिन में धूप तूरकर भरता हैसूर्य।रात में चाँदनी तूरतेचन्द्रमा और तारे।रक्त नित्य तूरताहिंसक चक्र।हाय! मर्त्यभूमि —सदाआकाश का फेंका हुआ आँगन ही,कष्ट!
हम वास करते भूमि — क्या भूमि,देवताओं का खुला खुला स्थान।
दिन में धूप तूरकर भरता हैसूर्य।
रात में चाँदनी तूरतेचन्द्रमा और तारे।
रक्त नित्य तूरताहिंसक चक्र।
हाय! मर्त्यभूमि —सदाआकाश का फेंका हुआ आँगन ही,कष्ट!