"अँधेरे की धार पर काँपता जीवन,
रोशनी में भी खोजता अपना कारण।
ऋतुओं की थरथराती साँसों के बीच
मनुष्य क्या है—एक प्रश्न, एक कंपन।
समय की धूल में भीगती देह,
आशा की लौ से जलती आत्मा।
क्षणभंगुरता की ठंडी हवा में
वह अर्थ का दीप बचाए फिरता—
मर्त्य होकर भी अमरता का सपना।"

