माँ-बापदेकर लहू अपना जिसे माँ बाप हरपल सींचतेक्यूँ वो शज़र हो कर बड़ा देता न उनको छाँव हैविनोद सिन्हा "सुदामा"
माँ-बाप
देकर लहू अपना जिसे माँ बाप हरपल सींचतेक्यूँ वो शज़र हो कर बड़ा देता न उनको छाँव है
विनोद सिन्हा "सुदामा"