मैं पुरूष..!
पता चला..
आज विश्व पुरूष दिवस है
सोचा कुछ लिखूँ..
स्वयं पर एक पुरूष पर
लेकिन क्या कुछ समझ नहीं आता
नारी के व्यक्तित्व के आगे
इतना छोटा पड़ जाता हूँ
कि खो सा जाता हूँ कहीं..
मैं पुरूष....
जाने कब पा सकूंगा स्वयं को..
वैसे भी स्वयं का पा लेना
अर्थात ईश्वर को पा लेना है
और ईश्वर को पाना
इतना आसान नहीं
फिर एक तो हूँ नहीं मैं..
खण्डों में बँटा हूँँ...
और मेरे हर खण्ड की
अपनी अलग दास्तां है
अपनी अलग पहचान है...
अलग वजूद है अलग निशान है
देता हूँ बली खुद की
कर्तव्यों की हिमशिला पर
करता हूँ आत्मदाह
रिश्तों के बेदी पर हरबार
जबकि अरमान भी कितने होते हैं स्वयं के
लेकिन उनपर परत बनकर
जिम्मेदारियों की थकान बैठी रहती है
मैं पुरूष..
खुद में सिमटा
ख़ुद में फैला रहता हूँ हरपल
जीता हूँ जीवन साथ कई
पर उफ्फ तक नहीं करता हूँ..
कभी एक माँ के लिए
बेटा बन जाता हूँ
तो एक पिता की लाठी...
बहन का भाई तो पत्नी का पति..
बेटी की ख़ुशियाँ तो बेटे का अरमान
हर घड़ी हर समय हर हाल में
जी तो सबके लिए लेता हूँ....
पर स्वयं को जीत नहीं पाता कभी...
टूटता हूँ बिखरता हूँ..
फिर स्वयं को स्वयं में समेट लेता हूँ..
मैं पुरूष..
रोता हूँ हँसता हूँ आहें भरता हूँ
चाहता हूँ कई बार पिघलना
लेकिन जाने क्यूँ पत्थर हो जाता हूँ
मानों हर संवेदनाएँ
स्वयं के लिए मर गयी हो जैसे
इसलिए हरबार आलोचनाएँ सहकर भी
भावनाएँ व्यक्त नहीं कर पाता हूँ..
मौन रह जाता हूँ
पर सच कहूँ तो मेरा मौन
मुझम़ें ही चीखता रहता है हरपल
करता है मुझसे ही सवाल कई..
पूछता है मुझसे आखिर कबतक
करता रहूँगा प्रायश्चित मैं
स्वयं के पुरूष होने का..!!
सोचता हूँ तन्हा कई बार
जाने कब पा सकूंगा स्वयं को..
या सच म़े करता रहूँगा
प्रायश्चित ताउम्र और
सहता रहूँगा दंष जीवन भर
स्वयं ही पुरूष होने का..!!
स्वयं के पुरूष होने का..!!
विनोद सिन्हा "सुदामा"

