मैं बेरोज़गार..!!


ना मैं देव ना मैं दानव 

ना एलियन ना कोई अवतार 

ना अलग कोई धर्म है मेरा 

ना ही भिन्न मजहब़ आकार 

दिल धड़कन सब आम लेकिन 

अंतस में मेरे हाहाकार

हाड मांस का मैं जिंदा मुर्दा 

मैं हूँ बेरोज़गार..!!


हाँ..मैं एक बेरोज़गार


जीवन गरल है मन में दहक है

द्वंद्वयुद्ध है हरक्षण यलगार

हर तरफ़ रौशनी भरी है जब तो

क्यूँ किस्मत में अंधकार..

भटकन सी लगती जिंदगी ख़ुद की

भटकूँ सड़को पर सबकुछ हार

भँवर जाल में फँसा मैं ढूँढता 

कभी साहिल कभी पतवार..

बहा जा रहा जाने किधर मैं

लिए लाश़ किस छोर किस धार

लड़ रहा खुद की साँसों से खुद मैं

ना नाविक ना खेवन हार..!!


मैं बेरोज़गार...


जिंदा हूँ पर लाश़ हूँ इक

लाशों का मुझमें अंबार

सजी चिताएं मन में कितनी

जलती नित्य लाशें हजार

आकांक्षाएँ पिता की जलती मुझमें

जलती उम्मीदें और अधिकार

जलती माँ की मोह ममता

जलता माँ का निर्मल प्यार

बहन जल रही बिना दहेज के

जल रहा भाई का भविष्य आधार

जल रही सगे संबंधी की चाहत

दोस्त सखा मेरे सब यार

कोशिशें सारी जलती दिख रही

संग हिम्मत और मेरा संस्कार

क्या कहूँ होता दुख़ कितना 

होता कितना मन बेजार

देख चिता पर जलते सपनें 

और मेरी मेहनत लगातार.!!


कितना गरल पिया शंकर ने.?

जितना रोज मैं पीता हरबार

ताने सहता उल्हाने सहता

सुनता गालियों की बौछार

पाल पोस किया बड़ा जिसने 

कहता मुझको बेगैरत बेकार

पढ़ लिख तमगा लाख लिया पर 

रहा काहिल निकम्मा बेगार..

इससे तो अच्छा था कि तू 

रहता अनपढ़ मूरख गंवार

नामुराद नालायक बेहया

बेशर्म नीच मक्कार

मरता भी ना मरने देता

करता बस सबको शर्मसार

मिलतें संबोधन कितने ऐसे जानें

जिनका ना तो मैं हकदार

अजब गजब सी उपमाओं से

पड़ता हर दिन होना दो चार

कल तक प्रेम बसा जहाँ था

है अब सिर्फ़ घृणा तिरस्कार

मिली नौकरी न पढ लिख तो

बदला सबका का व्यवहार.!!


कैसे किसको क्या बतलाऊँ

क्या मैने परित्याग किया

खातिर इक अदद नौकरी के मैंने

घर बार सब त्याग दिया

त्यागा संगत त्यागी बैठक

त्यागा हर गली मुहल्ला

मिली नौकरी नहीं मुझे तो

कहते सब मुझको निठल्ला..!!


क्या कहता कितनी अर्ज़ी डाली

पढ़ मैंने नित्य नयी अखबार

धूलें फाँकी रस्तें नापे

देखा जब जब निकला इश्तिहार

ताली पीटी थाली पीटी

जब जो कहती सरकार

नहीं मिली नौकरी कोई लेकिन

न मिला कहीं कोई रोज़गार

सो जाता हूँ भूखा प्यासा

कई दिन कई रात गुजार

थका हारा घर लौटता जब हूँ

हर सम्त़ से हो बेजार..!!

सोचता कबतक रहूँगा आखिर

बन अपनों पर मैं भार

करता ख़ुद से खुद ही जब हूँ

तन्हा अकेले में साक्षात्कार. !!


किससे बाँटू मैं दर्द दिल का

किसका आखिर करूँ प्रतिकार

चलती साँसें भी जब लगतीं

जीवन से ली उधार

शून्य हो चुकी इंद्रियां सारी 

आतें मन में कई कई विचार

आत्महत्या भी कर लूँ तो क्या 

हो जाएगा मेरा उद्धार

मर कर भी तो माँ बाप पर बोझ

बना रहूँगा मैं अभागा लाचार..!


मैं बेरोज़गार मैं बेरोज़गार.!

मैं बेरोज़गार मैं बेरोज़गार.!!


©️®️विनोद सिन्हा "सुदामा"