"लक्ष्मी"
हर तरफ दीवाली की धूम थी.! पूरे शहर की चहल पहल अपनी चरम सीमा पर थी,एक दिन बाद ही दीवाली थी,सारा शहर दीवाली के स्वागत में रोशनी से झिलमिला रहा था.! हर घर सजे पड़े थे,हर दुकान रंग रोगन के बाद चमक उठी थी,बाजार सजकर बिकने को तैयार था,कहीं चीनी मिट्टी के बर्तन बिक रहे थे तो कहीं सोने चाँदी के आभूषण
,कहीं मिठाई की दुकानों से आने वाली मीठी सोंधी सुगंध मन को लालायित कर रही थी,तो कहीं ताजे फल और फूल सबके मन को आकर्षित कर रहे थे,कोई ठेले पर पटाखे बेच रहा था तो कोई झालर और फुलझड़ियां.! मैं भी आज बाजार चला आया था,सोचा आज धनतेरस है कुछ ले लूंगा,मेरी माँ कहा करती थी कि इस दिन कुछ न कुछ खरीदना चाहिए, इससे लक्ष्मी घर आती है,और मैं मुरख ये सोच कर हँस देता था कि यह कैसा त्योहार है जो लक्ष्मी को लाने के लिए लक्ष्मी को खर्च करना पड़ता है,हाँ ये अलग बात है कि लक्ष्मी जी आज तक मुझपर पूरी तरह से मेहरबान नहीं हुईं,खैर मेरी नज़र सामने के एक छोटी सी दुकान की ओर जा जा कर टिक जा रही थी,इसलिए नहीं कि वह दुकान छोटी थी,बल्कि इसलिए कि वह दुकान मुझे मेरी औकात की लग रही रही थी,मेरे दिल और दिमाग मेरे तंग हालात एवं फटी जेब की सच्चाई या यूँ कहें यथार्थ का बोध करवा रहे थे,मानो कहना चाहते हों कि दीवाली मनाने के लिए कुछ जरूरी सामान चाहिए,जैसे- रंग-बिरंगे काग़ज़,लक्ष्मी गणेश की मूर्ति या फिर कोई तस्वीर,थोड़ी-सी मिठाई और पूजा का सामान और सबसे बढ़ कर मिट्टी के कुछ दीये और उन्हें जलाने के लिए तेल, क्या ये सब उतने पैसे में आ जाएंगे जितने मेरी जेब के एक कोने मे पड़े थे,सहसा मेरा एक हाथ मेरी जेब को टटोलने लगा और जब बाहर आया तो उसमे सौ का एक पुराना नोट था.। मैं हँस पड़ा,मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि इस सौ रूपए में मैं क्या खरीदूँ और क्या नहीं कि तभी मेरी नज़र पसीने से लथपथ एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी जिसके साथ एक बूढी औरत भी थी जो अपनी फटी सारी के पल्लू से उस बच्ची को ढके थी और वह बच्ची अपनी मधुर आवाज में चिल्ला रही थी लक्ष्मी ले लो,गणेश ले लो,दिये ले लो,दीप ले लो.।
मेरे कदम उस दुकान को छोड़ स्वतःउस बच्ची की ओर बढ़ गएं.।
पास जा कर मैंने उससे पूछा..
दीये क्या भाव दिए मुन्नी.?
वो बच्ची कुछ जवाब देती इससे पहले पास बैठी बूढी माँ ने शायद उसकी दादी या फिर माँ हो ने अपनी लड़खड़ाते स्वर में कहा..
ले लो बाबू रूपए का एक है...
पर पचास का सौ दे दूंगी, सुबह से एक भी नही बिकी सब बल्ब और बत्ती खरीद रहें, मिट्टी के दीये तो कोई पूछता ही नहीं...?
बोहनी भी नहीं हुई और हम दोनों ने सुबह से कुछ खाया पीया भी नहीं है
मैं कुछ कहता कि वह बच्ची बोल उठी ले लो न भैय्याजी... कुछ दीये बिक जाएंगे तो कल हम भी दीवाली मना लेंगे.।
और यह कर उसने मुझपर अपनी दोनो छोटी आँखें जमा दी और उम्मीद भरी नज़रो से मेरी ओर देखने लगी...।
मन करूणा से भर गया,मैं थोड़ी देर शांत स्तब्ध खड़ा रहा,कुछ कह ही न सका..फिर जाने क्या सोच उन्हें वहीं छोड़ सामने हलवाई के दुकान की ओर बढ़ गया,मैंने हलवाई से बीस रूपए के मिठाई (बताशे ) लिए,बीस रूपए का फल,फिर बीस रूपए के वहीं पास से कुछ पटाखेे लिए और बचे चालीस रूपए हाथ में लिए मूड़ गया उस दीये बेच रही बच्ची की ओर...।
मुझे पुनः अपनी ओर आता देख उन दोनों के चेहरे खुशी से चमक रहे थे,मैंने दूर से ही महसूस किया कि दोनों के चेहरे जो कुछ क्षण पहले मेरे आगे बढ़ते ही मायूस हो गये थे अभी उन चेहरों से एक विश्वास झलक रहा था,एक उम्मीद कि मैं उनके सारे दीये खरीद ही लूँगा.।
मैं अभी उनके पास गया ही था कि बच्ची बोली कितने दूँ भैय्याजी ..?
मैंने कुछ नहीं कहा,चुपचाप सारे खरीदे सामान उस बच्ची के हाथ में रखे एवं बचे बीस के दो नोट उस बूढी औरत के हथेली पर,बस एक दीया उठाया और बिना कुछ कहे चल दिया,पीछे मुड़कर देखा तो बूढी औरत के आँखों में आँसू थे और बच्ची के चेहरे पर खुशी,उसे उसकी दीवाली मनाने की और मैं प्रसन्नचित्त मन से अपनी माँ को याद करता घर की ओर चल दिया था "निर्धन लक्ष्मी" के चेहरे पर मुस्कान देकर,सच कहूँ तो दीवाली का आनन्द आज के जैसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था.।।
विनोद सिन्हा "सुदामा"


