वक़्त बहोत कम मिल रहें हैं आज कल
उलझा हूँ इस कदर की काम और घर
इस ब्यथा को थोड़ा समझ जो इससे निकल पाता
इतना भी वक़्त अब कहाँ हैं मिल पाता
और कोई पूछे मुझसे क्या होता हैं
अपने मोहब्बत (कलम) से दूर रहना
जिसे लगाये तो रखता हूँ सीने से पर
कह नहीं पाता जब ये कहना चाहे
जैसे शब्द तो हैं पर लिखने को
समय ही नहीं हैं मिल पाता
बड़ा मुश्किल होता हैं वो वक़्त
और उन लम्हों से निकल पाना
जब दिल ना चाहते हुए भी पड़ता हैं
लोगों के सामने मुस्कुराना
अब तो दिन कटता हैं हर पल
उन लम्हो के इंतजार में
की थोड़ा जो वक़्त मिल पाता
तो उन लम्हों को पन्नों पे उतार पाता
और डर रहा हूँ कहि दुनियादारी में इतना ना उलझ जाउ की
शब्द तो हो पर जिम्मेदारी कहि कलम पे भारी ना पड़ जाये
- विनय

