निकला हैं जनाजा मेरा झूम के

और फिर बजी हैं सहनाई मेरी 


पहली बार सेहरा सजा था तो

आज होने को रुखसत हूं तैयार तो


सुना था लोगो की भीड़ से होगी पहचान मेरी

पर ये ना सोचा था कि मेला ही लग जायेगा


जो ना आया था कभी महफ़िल में मेरी

देखों वो भी आया हैं कहने अलबिदा


और चलता हूँ दोस्तो अब थक गया हूँ 


चंद शब्द जो छोड़े जा रहा हूँ अधूरा

उम्मीद हैं कोई "राहत" उसे पूरा कर जायेगा


वसीयत तो नही पर मेरा 

अक्स उसमे नजर आयेगा


मेरी पहचान को वो आयाम देगा

जो छोड़े जा रहा हूँ उसे मेरी पहचान देगा


- विनय