कुछ जो लिखता हूँ 

बस एक आस होती हैं


की कोई देख ले नज्म मेरी भी

दिल को उसकी नजरों की प्यास होती हैं


पर ना जाने क्या खता हो गई हैं

पहले तो झाँक भी जाया करते थे


अब तो नजरों से ही उनके

ओझल मेरी नज्म हो गई हैं


पर जाने क्या ऐंसा कह बैठा हूँ 

जिससे मैं अब तक अंजान हूँ


हैं बस एक खवाइश मेरी जो सजा 

दिया हैं तो इल्जाम भी बता देते 


मैं गुनाह कबूल कर लेता 

कम से कम एक बार तो कह देते


दिल ही तो हैं पर हैं तो शीशे का 

कहि टूट ना जाये


ऐंसे भी मुह ना फेरो 

कहि इरादा छूट ना जाये


अभी तो सुरु ही किया था 

और ना जाने क्या क्या कहना था


पर ऐंसे जो नजरें फेर लोगे तुम

तो नजरों से गिड़ के अब रहा ना जायेगा


जो तेरी नजरों से ओझल मेरी नज्म हो जायेगा




- विनय