उड़ता फिरता मैं भी
फिजाओं में यहाँ वहाँ
पर अहमियत ही ना थी
मुझे मेरे "पंखो" की
रखना था जिसे बड़े जतन से
मैंने तनिक भी ना सोचा की
आखिर होता हैं क्या बिछड़ना
कभी धड़कन का दिल से
जैसे जिस्म तो वहीं ठहरी
पर रूह का पता ना था
मैं दूर तलक चलता तो गया
मंजिल भी उतनी दूर होती गई
पर मैं दरिया भी लांघ गया होता
जो मेरा वो पंख ( माँ - बाबा )
मेरा हमसफर होता
- विनय

