बड़ा बेचैन बैठा था कबसे की कैसे
इजहार ए मोहब्बत करू मैं उनसे
सोचा की मिल के कह दूंगा उनको
कभी सोचा कि खत मैं लिख भेजू
इसी कशमकश में सोया ना सारी रात
आखिर कैसे कहु मैं उनको अपनी बात
मिलता हूँ रोज पर पहले कभी ऐंसी हालात ना थी
जब से आये हो दिल में एक कसक सी लगी रहती हैं
अब तो बस तुम्हे सोचता रहता हूं हर लम्हा
कब होती हैं सुबह और ना जाने कब शाम
आखिर कैसे मैं कह दु उनसे की अब
जिंदगी तुम बिन मुकम्मल ना होगी
तो उठाया हैं कलम और लिख दिया हैं
इजहार ए मोहब्बत अपना
संभालना बड़ा नाजुक हैं "ये"
खत मैं भेज रहा हूँ रख के "दिल" अपना
- विनय

