भला इल्जाम हम क्या औरो को देते

जब अपने ही दामन में दाग था


बहोत समझाया था अपनों ने हमे

पर दिल तो दिल था एक ना माना


तेरे झुठे इश्क़ पे बेपरवाह ये चलता गया

खुद को अपने ही कब्र तक पहुचाता गया


पर आँख खुली जब खुद को देख सहम सा गया मैं

भला ये लेटा हैं कौन खुद से खुद को पुछ रहा था


जब तलक साँसे रही हम रहें ना खुद के

और अब मरके भी रूह रहा ना खुद का


तेरे झूठ पे एतबार तो कर लिया था मैंने

पर हर पल आंखे कुछ और कह रही थी तेरी


काश की आंखों को पढ़ना सिख लिया होता

तो इस कदर खुद को खुद ही ना अलबिदा कह रहा होता


- विनय