झूठ  है की अब नहीं मिलेंगे ,

साथी तुम को आना होगा ....

 

एक वायु मंडल, एक हवा है,

एक आकाश सब पर फैला है,

एक दिन जिसमे सो जाना है,

वह एक ही अंचल मटमैला है |

 

बूंद-बूंद देखो धार बनी है,

एक समद में ढल जाने को |

उसी में खोना होगा सब को,

परा गमन का पल आए तो | 

 

जिस दिन सब बंधन टूटेंगे,

कोई ना बचा बहाना होगा |

साथी तुम को आना होगा  |

 

हाँ अलग आग है जो दोनों को

अलग चिता पर मुक्त करेगी |

फिर भी जलन एक, दोनों को होगी,

जो धीरे-धीरे लुप्त करेगी |

 

जब गरिमा की राख मिले मिट्टी में,

गुरुत्व मेरा आलिंगन होगा |

मुझ में ही आकर घुल जाओगे ,

जब धारा में प्रवाहित जीवन होगा |

 

जब धुंए संग उत्साह तुम्हारे,   

अथाह व्योम में गमन करेंगे |

हाथ पकड़ कर साथ चलूँगा,

वे मुझे गगन, कभी पवन कहेंगे |

 

उस पार अविरल चीर निद्रा होगी,

या जाग्रत, सान्द्र जीवन का अर्क मिलेगा,

कैसे कहुं फिर जन्म मिलेगा,

या मोक्ष, स्वर्ग और नर्क मिलेगा ?

 

अब देह ये शायद मिल ना सके,

और आत्मा क्या है पाता नहीं |

पर शाश्वत मौलिक से, मिलेगा शाश्वत,

दूर नहीं बस यहीं कहीं |

 

तत्व मौलिक अविनाशी है,

नश्वर यौगिक संरचना है |

उन्हीं में सर्जित यही विसर्जित,

होगी ये जो सारी रचना है |

  

इन संयोगों के देहों को वापस

फिर इन ही तत्वों में जाना होगा |

वही जहाँ मैं भी जाऊंगा,

साथी तुम को भी आना होगा |