होठों पर महकती पंखुड़ियां सजने लगी
और मैं पत्तों पर ओस की बूंदों जैसा ठहर गया
वो थक कर मेरी बाहों में सिमट गयी
जैसे कई मील रेत को काटकर कोई नदी समंदर में सिमटती हो
वो पल मेरी यादों में ऐसे बस गया
जैसे दुल्हन कोई अपने हाथों में मेहँदी रचाती हो
उसने कांधों पर मेरे जो सर अपना टिका दिया


