कट गया पेड़
शेष रह गया ठूँठ
गई इसकी समस्त कला
गया है सकल साज।
अब यह वसंत में नहीं मचलता,
धनुष-सा नहीं झुकता,
चलते नहीं अब इसकी छाँव में काम के नयन-तीर,
झरते नहीं यहाँ अब दो प्रेमियों के नयन-नीर,
अब ना छाँह है - ना चाह है
केवल यादों को कुरेदता
शेष रह गया ठूँठ।



