आते और जाते श्वास के बीच
एक ऐसा पल आता है
जब एक श्वास दूसरे श्वास में परिवर्तित होती है
जहाँ एक ठहराव होता है
ये ठहराव ठीक वैसा ही है
जब तुमने पहली बार मुझे अपने से लगाया था
अपने होठों से मेरे गालों को छुआ था
सबकुछ जैसे ठहर गया था
सुना है, ऐसा ठहराव तब भी होता था
जब कान्हा अपनी बांसुरी बजाते थे
सुना है, राधा की नजरों में भी ऐसा ही ठहराव था
सुना है, सूरज भी ढलने से पहले समंदर के किनारे दूर कहीं ठहर जाता है
याद करता हूँ , हमारी - तुम्हारी बातों में रात भी कुछ ऐसे ही ठहर जाती थी
अपने कल को पाने के लिए
छोड़ कर मुझे, तुम चले गए
मैं अब भी उसी पल के ठहराव में तुम्हारा हाथ थामे ठहरा हुआ हूँ
एक अनंत ठहराव लिए....