शाम को जब हम सैर को जाते है थके - मांदें शरीर से भेंट कर जाते कुछ पसीने से तर-बतर कुछ धुंए में जकड़े होते है तो कुछ नशे में डूबे होते है, काम का बोझा लादे अपने-अपने गंतव्य को जाते इनमे से कुछ, नशे में खा-पी के पड़ जाते है कुछ औरत पे लहराते फिर लिपट के सो जाते है ज्यों - ज्यों रति की शीतलता चढ़ती जाती है पैरों से होती हुई चदर इनके मुँह को ढकती जाती है सवेरे होते-होते मैली-कुचैली चदर की तरह औरत भी इनके पैरों में दबी पड़ी पाई जाती है काम का बोझा भारी जो होता है... सवेरे जब हम सैर को जाते ढलती जवानी के कुछ युवा मिल जाते (ये कभी बूढ़े नहीं होते) ये घर-परिवार की समस्या से जकड़े होते है पर दिल के जोशीले होते है एक ही पल में ये देश-दुनिया की हवा बदल देते है अगले ही पल 'हमें क्या लेना देना' कहके संसार से बिछोह कर लेते है हाँ, कुछ साँसे ऊपर-नीचे करते है यम को चकमा देते फिरते है जोर -जोर से ताली पीटते है फिर एक सामूहिक अट्ठहास लगाते है शिलाजीत का ज्ञान बतलाते है ये पुरुष स्वास्थ्य की शायद यही परिभाषा समझ पाते है इन सबसे इतर कुछ झाड़-फूस और पेड़ होते है हम रोज़ सैर करते हुए इन्ही से मिलने जाते है बोलते कुछ भी नहीं ये पर बिन बोले जीवन का पाठ पढ़ाते है हम इसी पाठशाला में घंटो अपना जीवन बीताते है पूछ रहा है ये "मनु" सबसे फिर आखिर क्यों हमसब इनके कातिल बन जाते है ?