जो सीना ताने खड़े
आंदोलन की भेंट चढ़ जाते है
जो भरकर पेट हमारा
स्वयं भूखे ही सो जाते है
कौन है वे
जो सबकी झोली भरते है
और स्वयं हाथ फैलाते है
जो पत्थर-लाठी खाते है
और सड़कों पर चुपचाप सो जाते है
कौन है वे
जो मिट्टी में अपनी हड्डियां गलाते है
सिंचते है जिस वृक्ष को वर्षों खेतों में
स्वयं उसपे लटके मिल जाते है
ओ सत्ता के मतवालों
कानून के रखवालों
अब बस धर-धर धरती धूजें है
तुम फावड़े और हल का शंखनाद सुनों
ये वो है, जो कांधों पर हल ढ़ोते हैं
और मिट्टी में सोना बोते है
इनको पहचानों तो
बेहतर है
इनकी मानों तो
बेहतर है


