एक लौ जलाता हूँ, संकल्प दोहराता हूँ भस्म करके स्वयं को, मैं तुम्हें देख पाता हूँ ज्यों - ज्यों विकार जले तुम और उजले होते जाते हो शरण में तुम्हारी आता हूँ, मन-मुक्ति पाता हूँ राधा-सी आस लगाता हूँ मीरा-सा पूजता जाता हूँ मारुती बन धुन एक लगाता हूँ विश्वास है, मेरे आराध्य तुम मेरे पार्थसारथी हो !