जरा ठहरो बंधु! उस ओर ना जाना
यदि जाओ तो वापिस इस ओर मत आना
पूछेगा मुझसे कोई तुम्हारे बारे में
तो इस मिट्टी पर मैं 'काम' लिख दूंगा
उस ओर रति-काम का डेरा है
कस्तुरी की महक है
भीगे बदन में तेज प्यास है
और अधिक पाने की आस है
मैं.., मैं फरार हूँ
नदियां की धार हूँ
जो भटकते-भटकते अपने समंदर से मिलने चली है
जैसे समंदर का पानी तट को चूमता है
तट की मिट्टी में बार-बार रमता है
मैं भी रमने चला हूँ
घुलने चला हूँ


