
मैं देख रहा था उसे
रोज़ खुद से झूझते हुए
झुके काँधों पर परिवार का बोझ लिए हुए,
दबे होठों पे मुस्कान लिए हुए,
अँधेरे में चमकने की कोशिश करते हुए,
टूटते - बिखरते हुए , पल -पल खुद से झूझते हुए...
बरतनों को घिसती,
यादों को कुरेचती,
कपडे जमाती, थोड़ा गुनगुनाती,
बालों को गूंथती,
खुद से बतियाती,
जीने की लौ जगाती,
मैं देख रहा था उसे...
जैसे बादलों में
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