मैं देख रहा था उसे रोज़ खुद से झूझते हुए झुके काँधों पर परिवार का बोझ लिए हुए, दबे होठों पे मुस्कान लिए हुए, अँधेरे में चमकने की कोशिश करते हुए, टूटते - बिखरते हुए , पल -पल खुद से झूझते हुए... बरतनों को घिसती, यादों को कुरेचती, कपडे जमाती, थोड़ा गुनगुनाती, बालों को गूंथती, खुद से बतियाती, जीने की लौ जगाती, मैं देख रहा था उसे... जैसे बादलों में छिपा चाँद दिखाई देता है वैसे ही दिखती वो अपनी चमक लिए हुए, रातों में सुनती थी सुबकियाँ उसकी सबकुछ तो कहती थी, सूजी आँखें उसकी नाजाने क्यूँ ये सब दिखाई नहीं दिया, उसके अपनों को क्यूँ नहीं सुना, उसके जीवन संगीत को, क्यूँ नहीं आया कोई मदद को, अब बर्फीली हवाओं-सा चीरता सूनापन है और दरवाज़े की चीर से मैं देख रहा हूँ उसे लटक रही है जिंदगी बड़ी ख़ामोशी से