जानती हूँ मैं तुम अपने सारे पाप मुझपे मढ़ने आये हो मेरे जिस्म को मैला कर अपनी रूह पवित्र करने आये हो फिर भी मैं, पहले तुम्हारे चरण स्पर्श करुँगी फिर स्वयं में डुबो के - लबों पर बैठ के तुम्हे निर्मल - ठंडा करुँगी ये जानती हूँ मैं कि अगला पल बिछुड़न का है फिर भी तुम्हे वो एहसास दूंगी कि अपने जीवन की यात्रा तुम मुझमें ही समर्पित करोगे देखो ! कैसा अद्भुत मिलन है ना तुम मैले हुए और मैं....मैं और पवित्र हो गयी जैसे रात सुबह को गले लगाकर रोती है अब वैसे ही विदा लेती हूँ तुमसे मैं हाँ, सबकुछ जानती हूँ मैं...