कुछ धूप इक्कठा करके रख रखी है मैंने, हाँ, वही धूप जो हमने साथ चुराई थी हाँ, वही धूप जो गुजरती थी जब तुम्हारे तन से होकर तो मुझको भी तपाती थी हाँ, वही धूप जो हमारे रगों में जमे रक्त को पिघलाती थी जो हमदोनों को खूब सुहाती थी हाँ, वही धूप जो सर्द चांदनी रातों में भंवरों में गुंजन करवाती थी जो हमदोनों को राधामोहन बनाती थी हाँ, वही धूप कुछ इक्कठा कर रखी है मैंने जो हमने साथ चुराई थी