धीमे प्यार में एक अलग कशिश होती है

धूपबत्ती के जैसे जलता है एकदम धीमे-धीमे

जिसकी सुगंध तन-मन को महकाती रहती है

 

यात्राएं रोज होती है लेकिन बिलकुल धीमे-धीमे

जैसे कोई बूढ़ा बाबा साइकिल के पेडल पर पैर चला रहा हो

या कोई बूढ़ी अम्मा गुनगुनी धुप में स्वेटर बुन रही हो

 

इतना धीमे होता है कि हाथों की अंगुलियों को पकडे बैठा रहता है

ना हिलता है ना चलता है

और कुछ मोड़ ऐसे जहाँ मनभर के आलस बिखेरता है

ये मोड़ गोद भी है और सीना भी

 

यूँ तो साँसे नाभि, नाक और मुहँ से आती-जाती रहती है

लेकिन धीमे प्यार की दुनिया में

साँसे भी गोल होते हुए होठों पर ही

धीमे-धीमे गोल-गोल घुमती रहती है

 

धीमे प्यार की शक्ति में सबकुछ इतना धीमा होता जाता है कि

गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी क्षीण पड़ जाती है

रूहें हवा में तैरने लगती है

उम्मीदों का आशियाना बुनती है...नवजीवन सृजन करती है

 

शास्वत, सुखद, निराकार – धीमा प्यार...