वह एकांत में जागकर चिंतन में डूबता कभी दयालु तो कभी निर्मम बन कागज़ पर आता विचार और कलम को करके एक वह स्वयं को टिकाता चंद विचारों की प्यास मिटाने वो कलम को स्याही से बार - बार मिलाता साथ भाषाएं और बोली भी है सभी उसको प्यारी है कलेजे पर पत्थर रख इन सबमें वह किसी - किसी को पन्नों पर सजाता घूँट - आंसुओं की पीकर रह जाता न्यौछावर कर अपनी रचना पाठकों - श्रोताओं कि भूख मिटाता जाता दानवीर की नयी परिभाषा वो गढ़ता जाता