पतंग पर संदेश लिखकर
छत पर ना गिराना प्रिये!
पूछेंगी सारी सखी प्रिये!यह छत वही है जिस पर चढ़कर,
चरखा पकड़कर, मुड़-मुड़ कर तुम्हें देखना,
तान देते पतंग के साथ वो तुम्हें ताने देना,
हँसकर चिढ़ाना, पतंग कटने पर छत से नीचे चले जाना,
फिर चुपके से खुद को तुम्हारी नजरों में ढूँढना।वो तुम्हारी बैचेनी बहुत कुछ कहती थी,
'काई पो छे' की आवाज़ नीलें आसमान में गूंजती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
पतंग-सी उड़ती फिरती थी,देखे सबके ताव प्रिये!
रंग छोड़ते घाव प्रिये!
चरखे से लिपटी डोर हूँ प्रिये!
मैं आज तुम्हारी हूँ प्रिये!
हाँ मैं तुम्हारी हूँ प्रिये!