
मजदूरों की मजबूरी का अजीब तमाशा बनाया जा रहा है,
जिन्होंने शहर बनाया
आज उन्हें सड़कों पर चलाया जा रहा है।
तपती धूप, सिकती सड़के, मासूम चेहरे
आंखों से देश का स्वाभिमान बहाया जा रहा है........
लाशों का ढेर लगा है उस ओर
और यहां केवल बवाल बनाया जा रहा है।
सरहदें तो बची ही नहीं उनके लिए,
बस परिवार कीमती,
हजारों मीलो की दूरी और
दाव अपनी जान का लगाया जा रहा ह
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