❝ लिखना चाहता हूँ, मग़र कोई मिसरा नहीं मिलता!
इश्क़ और तेरे सिवा कोई तीसरा नहीं मिलता ।।
माना समंदर कई नदियों को अपने अंदर लिए फ़िरता है!
मग़र आंखों से तुम्हारी कुछ गहरा नहीं मिलता ॥
मिलने को हर कोई मिलता है राह दिखाने को!
मग़र मंजिल का कोई भी रास्ता ज़रा नहीं मिलता ।।
ये मुस्कुराहटें,ये हँसी तो फ़क़त झूठी लगती है!
अंदर से कोई शख़्स ख़ुशी से भरा नहीं मिलता ।।
सुनी है बातें सबकी तमाम!
पर तुझ जैसा बातों पर, कोई ठहरा नहीं मिलता।।
तुम जैसा कोई है ही नहीं, क्यों ढूंढूं मैं तुम्हें बाहर !
चेहरे तो बहुत मिलते है, पर तुझ सा शख़्स नहीं मिलता ।। ❞

