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अकेला इंसान

उसे देखो,

वह अपनी ही जंग में

खुद से ही खफा है

कि क्यूँ जिंदगी उसकी

मुश्किलों का मकान है।


जिंदगी न जंग है

न ही गम का पैगाम है

लेकिन उसे यही मानने की जिद है

क्यो उसे ये झूठा

इलहाम है।


सुकून डरा हुआ

खड़ा है उससे कोसों दूर

उसके ही जंगी जुनून से

फिर वही कहता फिरता है

कि वो अकेला इंसान है।


ख़ुद आई

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