जिम्मेदारियों ने कुछ यू उलझाया मुझे
मानो बचपन कब का छूट गया
वो किताबे वो मस्तियां कहीं ऐसे खो गई
अंधेरे में रोशनी को तलाशते हो जैसे
कुछ यूं टूट कर मजबूत हो गया
मानो रेत से पानी निकालते हो जैसे
खो गई अपनी सारी हसरते
बस सुकुन अपनो की खुशियों में मिलती है जैसे
उम्मीद हैं खुद जल कर अपनो को खुश रख पायेंगे
हर कठिनाई से लड़कर आगे ही बढ़ते जाएंगे
भवानी शरण।

