देखे खुली आँखों से वो अनजान सपने
बीते साल पुराने हैं।
काँटे चाहे कितने हो सफर में फिर भी
खुशी के फूल सुहाने हैं।
परवाह नही अब किसी को किसी की
ये तो बस बहाने हैं।
अमृत सा बरसता था हर रिशते से
हुये उन्हें जमाने हैं।
साथ होकर भी कयों न जाने
एक दूसरे से अनजाने हैं
अपने से लगने लगते जो
वो भी अब बिराने हैं।
कहाँ किसी के अधीन जिन्दगी
साँसों के ताने - बाने हैं
समेट लो जितना झोली भरकर
किसमत में लिखे ही पाने हैं।
कहे -लिखे शब्दों का मेरे
कुछ कहा अब माने हैं
अभिव्यकित मात्र ही देकर सबको
एक सभी को दर्शाने हैं।