जग ने मुझसे ये पूछा है

किस जाति की मै प्राणी हूं

मस्तक को तान के कहती हूं

इस पृथ्वी की मैं नारी हूं।

जज्बो में जिसकी त्राहि थी

हुंकार ही जिसकी वाणी थी

सर बांध कफ़न जो लरती थी

उस झांसी की मैं रानी हूं।

अन्तरिक्ष के यात्री को

हिम्मत और जज्बा दात्रि हूं

इस देश को जिसने जीत लिया

उस इंदिरा की मैं गांधी हूं।

नेत्रों में जिसकी अग्नि है

ज्वाला ही जिसकी शक्ति है

माता की पदवी धारी है

उस दुर्गा की मैं काली हूं।

जिस जंगल में पतझड़ ना हो

उस जंगल में पर्णपाती हूं

मलिन किया जिन नज़रों ने

उन नज़रों की मैं घाती हूं

इस पृथ्वी की मैं नारी हूं।