मन की गहराइयों में ही भीड़ जाता
सही और गलत की कश्मकश में
खुद ही कभी अपनों से उलझ जाता,
खुद के उद्दत शब्दों से टूटता
खामखा तिनको सा बिखर जाता,
आँखों में नम से अरमान लिए
उजाले के सपने बुनते जाता,
मन की गहराइयों में ही भीड़ जाता...
खिड़की के लगे पर्दो सा बेपरवाह
बेवजह ही सरसरता जाता,
पानी की लहरों में खुद को समेट कर
हवा के झोके सा चलता जाता,
जीवन के अंधेरो को सुलझाता
किसी 'भावि' के सवेरे को खोजता जाता,
मन की गहराइयों में ही भीड़ जाता...


