लड़खड़ाए कदम कई बार, संभलते संभलते
गिरे भी संघर्ष में कई बार, चलते चलते
फिर भी मंज़िल को, ना भूला कभी भी
उम्मीद से आगे बढ़ा, ख़्वाबों से मिलते मिलते।
कभी पथराई ज़मीं मिली, तो कभी आसमां मिला
फिर भी चलता रहा, शाम के ढ़लते ढ़लते
ना भूख देखी कभी, ना प्यास से रुका कभी
पैरो में चाहे घाव हुए,या छाले हल्के हल्के
लड़खड़ाए कदम कई बार,संभलते संभलते।


