ना कभी तपन हुई, पिता की छांव में

ना कभी घुटन हुई, पिता की छांव में

बारिश से भीगे बड़े होकर शायद कभी

सूखे रहे सदा हम, पिता की छांव में।

अमीर इतने चाहे न थे, पिता की छांव में

पर कमी कभी ना मिली, पिता की छांव में

अब हर रोज़ नया संघर्ष है ज़िन्दगी

तब त्योहार था रोज़,पिता की छांव में।