ना वो गाँव हैं आज

ना पेड़ों की छांव हैं आज।

ना चिडियों की चहचहाहट है

ना हवा में वो सरसराहट है।

गाड़ियों का बस शोर है

स्वार्थ ही चारों ओर है।

ना दया, ना ममता है

ना सेवा की क्षमता है।

कहाँ ये देश मेरा जा रहा है

कैसा ये विकास पा रहा है।

प्रकृती को खा रहा है

सज़ा भी ख़ुद पा रहा है।

काश फ़िर वो दिन आ जाएँ

जहाँ ख़ुशहाली ही पाएँ।

ना दुःख हों ना ग्लानि हो

ना कोई भी अभिमानी हो।

ऐसा फिर से संसार करदे

रोशनी का फिर से वर दे

रोशनी का फिर से वर दे।