दूर एक लौ देखकर खींची चली गयी,
दूर खड़ा था वो लौ,
हाँ लौ से कम नहीं था वो,
जिसे छूने के लिए लड़ती चली गयी।
पर, हर सफर का अपना अंत होता है ही,
इसका अंत भी ज़रूरी था, सो हुआ ऐसा ही।
पहुँच गयी थी वहां, लौ खड़ा था जहाँ,
जी हाँ, " है " नहीं वो " था ",
लौ या भ्रम किसे पता ?
