मां की मम्ता दर्शाती है प्रेम ।
पिता की आवाज़ में भी मैहसूस होता प्रेम ।।
कभी खुद में, कभी खुदा में नज़र आता है प्रेम ।
पर आज तक कोई न समझ पाया इस शब्द को, जो कहलाता है प्रेम ।।
किसी के लिए ये ज़रूरत है, तो किसी के लिए मन्नत ।
किसी के लिए जन्नत है, और किसी के लिए रहमत ।।
किसी के लिए इन्तेहां है, किसी के लिए इल्तेजा ।
पर न जाना कोई आज भी, कि ये अल्फाज़ है बेइंतहा ।।
नगीने की तरह ढूंढ रहा है, आज भी इंसान इसे ।
पर भूल गया कि ये एहसास, बसा है खुद उसमें ।।
खोज है आज भी, इस अल्फाज़ की हर जगह ।
पर ये अल्फाज़ भी हर किसी को, हकीकत में कितना मिला ।।
कितनों ने निभाए, प्रेम में किए वादे ।
क्या पड़ गए कम्ज़ोर वक्त के साथ, प्रेम के भी ईरादे ।।
पूछा ये सवाल हमनें, जब रब्ब-उल-अफवाज़ से ।
मुस्का के फरमाया वो, कि मेरे बनाए इस लफ्ज़ को, आज तक जाना ही कहां है इंसान ने ।।
एक पल मुड़कर देख, नज़र आएगा प्रेम हर धर्म और इतिहास में ।
पर आज तक निभाना न सीखा कोई, प्रेम को इस जहां में ।।
तब आया ये समझ, सवालों के सैलाबों में ।
नहीं नापा जा सकता प्रेम को, चाहे चले जाओ ऊँचाईयों या गहराईयों में ।।
प्रेम का बनाने वाला तो एक है, पर उसे समझने वाले अनेक ।
पर फिर भी न जाना कोई, सच्चे प्रेम का संदेश ।।
किसी की भूख है प्रेम, किसी की प्यास ।
किसी के लिए अजूबा, और किसी के लिए एहसास ।।
नहीं जानता कोई आज भी, प्रेम की ताकत के राज़ ।
इसी प्रेम के खातिर, कुछ ने बनाया, तो कुछ खुद बन गए इतिहास ।।
हुआ एहयास जब हमें, इस अल्फाज़ का ।
तब पता चला, कईओं के जज़्बात का ।।
जाना हमनें के कौन है अपना, और कौन पराया ।
किस ने हमारे लिए सब कुछ छोड़ा, और किसने सब कुछ के लिए, हमें ठुकराया ।।
न जाने इस प्रेम के आभास में, कितनों ने हमें आजमाया ।
पर कोई भी आज तक, हमारे प्रेम को सही से पहचान न पाया ।।
हर इंसान कहीं न कहीं, निछावर कर रहा प्रेम ।
कर रहा है लगातार पृयास, कि प्रेम के बदले मिले प्रेम ।।
कभी अपनों में, कभी परायों में, ढूंढता है हर इंसान इसे ।
पर आज तक कितनों ने पाया, उनका सच्चा प्रेम ।।
एक बार ध्यान से महसूस करो इस लफ्ज़ को, जिसका नाम है प्रेम ।
तब होगा एहसास इस अल्फाज़ की सच्चाई का, जिसका नाम है प्रेम ।।
एक बार दाना बन के इस अल्फाज़ की हदें तलाशो ।
न मिलेगी कभी सीमा इस शब्द की, जो कहलाता है प्रेम, प्रेम, प्रेम ।।