क्या है जीवन की राह का पैगाम।
जो समझ ही न पाया आज तक कोई इंसान ।।
पाया क्या है जीवन में ।
इतना कुछ कर के कुर्बान ।।
क्यों तसल्ली नहीं अभी भी , भले ही छू लिया हो आसमान ।
इसी वजह से दिल, आज भी नहीं है शादमान ।।
पूछता है बार बार, जिंदगी के सैलाबों से होकर परेशान ।
क्या करना है मुझे, बता दे कोई महरबान ।।
नहीं है समझ आज भी, कि ये लम्हा लाया था क्या पैगाम।
क्या करना है आगे, नहीं पड़ता अब भी कुछ जान ।।
पैगाम है हर लम्हें में किसी न किसी के लिए ।
फर्क सिर्फ इतना है, कि उस पल को, जीते हैं हम किसके लिए ।।
रब के सिवा, कोई न यहां पर तुम्हारे लिए ।
फिर भी कुछ पल तो निकालो, रब और किसी अपने के लिए ।।
चाहे मत सुनों हमेंशा अपने दिल की आवाज़ ।
पर कभी तो महसूस करो, किसी के खामोशी के भी अलफाज़ ।।
मिलेगा तुमहें भी एक नया एहयास ।
और महसूस होगा अंजाम उसका, जिसने सफर का तुम्हारे साथ किया था अह्गाज़ ।।
क्या देना चाहते हो, संसार को पैगाम ।
जब खुद ही नहीं पता अपना मुकाम ।।
याद रख्खेगा ये जहां, न तुम्हें न तुम्हारी कोई दास्ताँन ।
पर याद रहेगा सबको, तुम्हारा सिखाया पैगाम ।।
इसलिए आज एक पल रुक के सोच लो ।
कि इस ज़िंदगी से क्या मिला, और अपनी ज़िंदगी से तुम ने, किसी को क्या दिया पैगाम ।।