कुदरत का बनाया नयाब करिश्मा है इंसान ।
एक दूसरे से कहीं न कहीं मेल तो खाता,
पर फिर भी हर किसी से फर्क है हर इंसान ।।
चेहरा सबका अलग-अलग,
पर एक चेहरे के पीछे भी,
छिपे न जाने कितने इंसान ।
एक बार ध्यान से देखो,
तो नज़र आएगा,
किसी के अंदर देवता,
तो किसी के अंदर हैवान ।।
न जाने कितने राज़ लेके जी रहा इंसान ।
हर जगह हर पल,
बदल रहा अपनी नीयत ये इंसान ।।
परखना हो किसी को,
तो तन्हाईयों में उसको देखो ।
तब नज़र आएगा,
उन मुखौटौं के भीतर छिपा असली इंसान ।।
बड़ी विचित्र पहेली है,
कि वक्त के साथ,
आखिर क्यों बदल जाता है इंसान।
कहीं अपनों से मुंह मोड़ कर,
कहीं किसी पराए को,
अपना बना रहा इंसान ।।
किसी को धोखे से गिरा रहा,
तो किसी बिखरे हुए को संभाल रहा ।
किसी को खून के आंसुओं से रुला कर,
कहीं किसी के आंसू पोंछ रहा ये इंसान ।।
हर पल अपनी नीयती बदलने के लिए कर रहा पृयास ।
और भूल गया कि इस यत्न में,
न जाने कहां खो गया उसके जीवन का प्रकाश ।।
न जाने कहां मंज़िल थी,
और न जाने कहां पहुंच गया इंसान।
जीवन सरल बनाने के लिए,
न जाने खुद कितना कठिन बन गया इंसान ।।
सवाल है ज़िंदगी का आज,
कि क्या चाहता है इंसान ।
अभी तक अपने दिल के करीब रहने वाले को भी,
ठीक से समझ पाया क्या कोई इंसान ।।
क्यों भूल जाते हैं कि आज भी रब है हम पर महरबान ।
वरना अब तक न जाने क्या कर जाते,
खुदा के बनाऐ ये इंसान ।।
कशमकश है अब भी हमें,
कि कैसा अजूबा है इंसान ।
फिर भी परवरदीगार नें उल्फत से फरमाया,
कि मेरी बनाई कुदरत की एक नेमत है इंसान ।।
बस खुदा बनने की होड़ में,
कभी खुद को ही न समझ पाया ।
इसलिए आज भी खुद अपने लिए ही,
एक पहेली बना खुद इंसान ।।