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एक पहेली – इंसान

कुदरत का बनाया नयाब करिश्मा है इंसान । एक दूसरे से कहीं न कहीं मेल तो खाता, पर फिर भी हर किसी से फर्क है हर इंसान ।। चेहरा सबका अलग-अलग, पर एक चेहरे के पीछे भी, छिपे न जाने कितने इंसान । एक बार ध्यान से देखो, तो नज़र आएगा, किसी के अंदर देवता, तो किसी के अंदर हैवान ।। न जाने कितने राज़ लेके जी रहा इंसान । हर जगह हर पल, बदल रहा अपनी नीयत ये इंसान ।। परखना हो किसी को, तो तन्हाईयों में उसको देखो । तब नज़र आएगा, उन मुखौटौं के भीतर छिपा असली इंसान ।। बड़ी विचित्र पहेली है, कि वक्त के साथ, आखिर क्यों बदल जाता है इंसान। कहीं अपनों से मुंह मोड़ कर, कहीं किसी पराए को, अपना बना रहा इंसान ।। किसी को धोखे से गिरा रहा, तो किसी बिखरे हुए को संभाल रहा । किसी को खून के आंसुओं से रुला कर, कहीं किसी के आंसू प
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