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अनिच्छा वाली दौड़

मैं दौड़ता गया

अनिच्छा वाली दौड़ में

मैं होना चाहता था जो हो ना पाया

गरीब किसान का बेटा था

अपने मन का कुछ न कर पाया

जरूरतों के आगे

सपनों ने आत्मसमर्पण कर दिया

ना जाने क्यों फिर भी

मैं अव्वल आया हर दौड़ में

मां-बाप की ईमानदारी

कठिन समय में भी उनकी

जिंदादिली और जीवंतता

बस यही सब

मेरी आंखो में तैरती रहते

इसीलिए शायद

मैं जीत गया

जीवन की हर दौड़ में


आज जीवन के दूसरे पड़ाव पर

जीवन में कुछ स्थिरता आई है

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