जाग विश्व क्रीड़ा करता है दिखा दीप फिर तम करता है,
देख धरा का यही सफर है जिधर है आदि अंत करता है!
जो अंत देख आगे बढ़ा है वह यहाँ कहीं बिखरा पड़ा है,
जिसको केवल आदि भान है ये जीवन अनंत करता है!
निर्जन में भी शहर बसे है और कई शहर वीरान हुए है,
देख वक़्त का हाथ पकड़ चल राई को पर्वत करता है!
चाहे हवा में महल बना ले नींव जमीं पर ही आनी है,
आँखों में आकाश छिपा है क्यों इन से निर्झर झरता है!
जाग विश्व क्रीड़ा करता है दिखा दीप फिर तम करता है!