सफर अभी और है प्यारे सुकूँ का नाम तू न ले, किनारे पे खड़े रहकर लहरो से इल्ज़ाम तू न ले!   जब तलक दूर है सागर तेरी गागर में आने से, तुझको है कसम दरिया प्यास का नाम तू न ले!   हज़ारो शाम ढलनी है, हज़ारो भोर होनी है, किसी इक शाम का होकर एक ही ज़ाम तू न ले!