देखो.... आसमाँ झुक रहा है, जैसे सलाम कर रहा है, चट्टान रास्ता दे रही है, कोई नदी मुड़ रही है| रवि फीका हो गया है, साँझ मुँह धो रही है, खग शोर कर रहे हैं, घर की याद आ रही है| चट्टान रास्ता दे रही है, कोई नदी मुड़ रही है| उसे भी देर हो गयी है, लोक लाज तानो का डर है, पर्वतो की ओट ले कर, घूँघट डाले जा रही है| चट्टान रास्ता दे रही है, कोई नदी मुड़ रही है| गोद में सोते हुए नावें, बढ़ी जा रही हैं किनारे, मल्लाहों का अमर गीत, आहा! रात हो रही है| चट्टान रास्ता दे रही है, कोई नदी मुड़ रही है|