रस्ता रस्ता रही उदासी,
रही किनारे आकर प्यास,
महफ़िल महफ़िल भटका जोगी,
भूला सारे मन्तर खास!
शहरों को शमशान बनाकर,
तिनका तिनका ढूंढी राख,
मिला न पर वो गुज़रा जमाना,
बीता था जो होकर पाख!
वो भी पनपा मेरे जैसा,
लेकर हवा पानी मिट्टी धूप,
पर वो निकला कितना मीठा,
मैं बबूल मन का कुरूप!
कोई सुराही मिट्टी की तो,
कोई जलता बनकर दीप,
मेरे अंतर घना अंधेरा,
कब हो सवेरा फैले प्रदीप!
उलझी सुलझी राह सफर की,
ठहरी निर्जन और वीरान,
वही करेगा पार सफर ये,
जिसकी हो धीरज की चट्टान!


