कभी गुज़रो जो गली से तो देखते जाना, हाल मेरा दर-ओ-दीवार से भी पूछते जाना!
मेरा सर न झुकेगा तेरे सज़दे के लिए, आह पहुंची है पास ये भी जताते जाना!
जमाने भर की रोशनी से रोशनी लेना, जाते जाते इन चरागों को बुझाते जाना!
आखिर इक रोज़ गुफ़्तगू ये पूरी होगी, जो भी हो सबब मुझको बताते जाना!
सुरों में साध के तुमको बजाई वीणा है, खुद को भूल के गीतों में झूमते जाना!
बारगाह-ए-इलाही, काशी ये मदीना है, जिस भी जमीं पे मोहब्बत हो चूमते जाना!


